भोपाल : सोमवार, जून 8, 2026 बालाघाट की वारासिवनी तहसील के ग्राम सांवगी निवासी राजवर्धन राणा ने अपनी प्रतिभा और लगन के बल पर पूरे प्रदेश का गौरव बढ़ाया है। राजवर्धन का चयन इंग्लैंड की प्रसिद्ध शिक्षण संस्था ‘द लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल
साइंस’ में ‘मास्टर ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन’ पाठ्यक्रम के लिए हुआ है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर वैश्विक स्तर की इस प्रतिष्ठित संस्था तक पहुँचने में मध्यप्रदेश शासन की ‘पिछड़ा वर्ग विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति योजना’ ने अहम भूमिका निभाई है।
आर्थिक रूप से सीमित किंतु होनहार विद्यार्थियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर की शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित ‘पिछड़ा वर्ग विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति योजना’ के तहत राज्य शासन राजवर्धन को पूर्ण वित्तीय सहयोग प्रदान कर रहा है। पाठ्यक्रम के प्रथम वर्ष की फीस के रूप में 40 लाख 70 हजार 736 रुपये की सहायता राशि स्वीकृत की गई है। योजना के प्रावधानों के अनुसार निर्वाह भत्ता (लिविंग अलाउंस), आकस्मिकता भत्ता, बीमा राशि और हवाई यात्रा का किराया भी राज्य शासन द्वारा वहन किया जा रहा है।
राजवर्धन राणा ने अपनी इस सफलता पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्रीमती कृष्णा गौर समेत पूरे प्रशासन का आभार व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि इस दूरदर्शी योजना के बिना उनके लिए इतने बड़े संस्थान में पढ़ने का सपना साकार करना संभव नहीं था। राजवर्धन ने कहा यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, परिश्रम निष्ठापूर्वक किया जाए और शासन की योजनाओं का समुचित लाभ उठाया जाए, तो सीमित संसाधन सफलता के मार्ग में बाधा नहीं बन सकते। वे भविष्य में उच्च शिक्षा प्राप्त कर समाज में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते हैं।
राजवर्धन जैसे कई छात्र विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति योजना के ज़रिए विदेश में पढ़ाई के अपने सपनों को साकार कर रहे हैं। इस योजना के माध्यम से मध्यप्रदेश सरकार उन मेधावी और होनहार युवाओं को एक मजबूत आर्थिक संबल प्रदान करती है, जो प्रतिभा के धनी हैं, लेकिन आर्थिक सीमाओं के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर की उच्च शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं।
योजना के बारे में जानिए
पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा संचालित ‘पिछड़ा वर्ग विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति योजना’ प्रदेश के युवाओं को वैश्विक मंच पर स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम है। इस योजना के अंतर्गत चयनित विद्यार्थियों को विदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में पोस्ट-ग्रेजुएशन, पीएचडी या रिसर्च की पढ़ाई के लिए ट्यूशन फीस का भुगतान शासन द्वारा किया जाता है। पढ़ाई के खर्च के साथ-साथ रहने और यात्रा का खर्च भी सरकार वहन करती है। योजना में निर्वाह भत्ता (लिविंग अलाउंस), आकस्मिक व्यय, स्वास्थ्य बीमा, वीज़ा शुल्क और विदेश जाने-आने का हवाई यात्रा (इकोनॉमी क्लास) का खर्च भी शामिल है।
योजना के लिए पात्रता
विद्यार्थी ने विदेश के किसी मान्यता प्राप्त और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय/संस्थान में प्रवेश प्राप्त कर लिया हो।
छात्र-छात्रा मध्यप्रदेश के मूल निवासी और पिछड़ा वर्ग श्रेणी (नॉन क्रीमी लेयर) के अंतर्गत आते हों।
पिछली परीक्षा प्रथम श्रेणी (कम से कम 60% अंक) के साथ उत्तीर्ण की हो।
आवेदक की आयु 35 वर्ष से कम हो।
भोपाल : सोमवार, जून 8, 2026
उप मुख्यमंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने कहा कि मध्यप्रदेश ने एचपीवी टीकाकरण अभियान में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल कर यह सिद्ध कर दिया है कि जनभागीदारी, स्वास्थ्य अमले की प्रतिबद्धता और प्रभावी नेतृत्व के बल पर बड़े से बड़े जनस्वास्थ्य अभियानों को समय से पहले सफल बनाया जा सकता है। उन्होंने अभियान से जुड़े चिकित्सकों, नर्सिंग स्टॉफ, आशा एवं आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, एएनएम, शिक्षकों, जिला प्रशासन तथा स्वास्थ्य विभाग के सभी अधिकारियों-कर्मचारियों के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्हें सफलता के लिये बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह अभियान प्रदेश की बेटियों को सर्वाइकल कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचाकर सुरक्षित भविष्य देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 28 फरवरी 2026 को देशव्यापी एचपीवी(ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) टीकाकरण अभियान का शुभारंभ किया गया था। महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से प्रारंभ किए गए इस विशेष अभियान में मध्यप्रदेश शीर्ष राज्यों में शामिल है। स्वास्थ्य अमले, सहयोगी विभागों की प्रतिबद्धता एवं सतत मॉनिटरिंग के परिणामस्वरूप प्रदेश में 7.63 लाख से अधिक पात्र बालिकाओं का सफलतापूर्वक एचपीवी टीकाकरण किया जा चुका है। यह अभियान मूल रूप से 90 दिनों के लिए निर्धारित था, लेकिन मध्यप्रदेश ने निर्धारित लक्ष्य को मात्र 60 दिनों में ही पूर्ण कर लिया जो प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की दक्षता और प्रभावी क्रियान्वयन का उत्कृष्ट उदाहरण है।
सर्वाइकल कैंसर भारत में महिलाओं में होने वाला दूसरा सबसे सामान्य कैंसर है तथा इसके अधिकांश मामलों का प्रमुख कारण एचपीवी संक्रमण होता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार यह ऐसा कैंसर है जिसे प्रभावी टीकाकरण के माध्यम से काफी हद तक रोका जा सकता है। एचपीवी वैक्सीन बालिकाओं को भविष्य में इस गंभीर बीमारी से सुरक्षा प्रदान करने का सुरक्षित, प्रभावी एवं वैज्ञानिक उपाय है। अभियान की सफलता में स्वास्थ्य विभाग, स्कूल शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, शिक्षकों, आशा एवं आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं तथा अभिभावकों की सक्रिय सहभागिता रही। प्रदेश के सभी जिलों में व्यापक जनजागरूकता, सूक्ष्म कार्ययोजना (माइक्रो प्लानिंग) एवं सतत मॉनिटरिंग के माध्यम से यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है।

भोपाल : सोमवार, जून 8, 2026 प्रदेश को निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में मध्यप्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी के संजय गांधी थर्मल पॉवर स्टेशन बिरसिंगपुर (SGTPS) ने एक बड़ी सफलता हासिल की है। स्टेशन की यूनिट नंबर 3 ने बीते 27 फरवरी से बिना रुके लगातार 100 दिनों तक बिजली पैदा करने का स्वर्णिम आंकड़ा छू लिया है। गौरतलब है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान भी कंपनी की कुल 13 उत्पादन इकाइयों ने 100 से अधिक दिनों तक लगातार निर्बाध बिजली उत्पादन करने का रिकॉर्ड बनाया था। इस शानदार ट्रैक रिकॉर्ड में अकेले संजय गांधी ताप विद्युत गृह बिरसिंगपुर का दबदबा रहा; जहां इसी यूनिट-3 ने पहले भी एक बार यह मुकाम हासिल किया था, वहीं स्टेशन की यूनिट-4 दो बार और यूनिट-5 ने एक बार इस ऐतिहासिक उपलब्धि को अपने नाम दर्ज कराया था।
सटीक परिचालन से गढ़े गए दक्षता के नए मानदंड
इस रिकॉर्ड परिचालन अवधि के दौरान यूनिट ने 89.18 प्रतिशत का प्लांट अवेलेबिलिटी फैक्टर (PAF) बनाए रखा, जो बिजली उत्पादन के लिए इस इकाई की उच्च उपलब्धता और तकनीकी मजबूती को प्रमाणित करता है। इसके साथ ही, इकाई ने 80.07 प्रतिशत का प्लांट लोड फैक्टर (PLF) दर्ज कर अपनी वास्तविक उत्पादन क्षमता के कुशल उपयोग का लोहा मनवाया। ऊर्जा दक्षता के मोर्चे पर भी प्रबंधन का प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा, जहां आंतरिक सहायक विद्युत खपत (APC) को महज 9.17 प्रतिशत पर सीमित रखकर बिजली की बड़ी बचत की गई।
उत्पादन इकाइयाँ उच्चतम विश्वसनीयता के साथ काम करने में सक्षम
मध्यप्रदेश पॉवर जनरेटिंग कंपनी के प्रबंध संचालक मनजीत सिंह ने इस गौरवमयी उपलब्धि पर गहरी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए पूरी टीम की सराहना की। उन्होंने कहा, “हमारे इंजीनियरों और तकनीकी टीम ने उत्कृष्ट संधारण (Maintenance) और कुशल संचालन (Operation) के दम पर बार-बार यह साबित किया है कि कंपनी की बिजली उत्पादन इकाइयाँ उच्चतम विश्वसनीयता के साथ काम करने में पूरी तरह सक्षम हैं। यही वजह है कि हमारी इकाइयाँ लगातार राष्ट्रीय स्तर के कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं और उत्कृष्ट प्रदर्शन का एक बेहद मजबूत रिकॉर्ड बना रही हैं।” उन्होंने कहा यह उपलब्धि तकनीकी कार्मिकों एवं ठेका श्रमिकों की सतत निगरानी, समर्पण तथा समयबद्ध गुणवत्तापूर्ण संधारण का परिणाम है।
डायरेक्टर टेक्निकल सुबोध निगम ने कहा कि यह सफलता पूरी टीम के आपसी तालमेल, सक्रिय कार्यप्रणाली और संकट के समय त्वरित फैसलों का नतीजा है। उन्होंने विश्वास जताया कि हमारे सभी विद्युत गृह भविष्य में भी प्रदेश को निर्बाध और भरोसेमंद बिजली देने में हमेशा आगे रहेंगे।
विदिशा के पोषण संजीवनी अभियान ने पेश की राज्य स्तरीय मिसाल
भोपाल : सोमवार, जून 8, 2026
प्रदेश को कुपोषण मुक्त बनाने के लिए निरंतर अभिनव और नीतिगत प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में विदिशा जिले से सफलता की एक ऐसी गौरवशाली गाथा सामने आई है, जिसने पूरे राज्य के सामने प्रशासनिक
सूझबूझ और जनभागीदारी का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के ‘स्वस्थ मध्यप्रदेश’ के संकल्पों को जमीनी धरातल पर उतारते हुए विदिशा जिला प्रशासन द्वारा शुरू किए गए ‘पोषण संजीवनी अभियान’ ने गंभीर कुपोषण के खिलाफ एक निर्णायक और प्रभावी जंग छेड़ दी है। यह अभियान इस बात का जीवंत प्रमाण बन गया है कि जब जिला प्रशासन और समाज की संवेदनशील ताकतें एक साथ कदम बढ़ाती हैं, तो कठिन से कठिन सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का समाधान सहज संभव हो जाता है।
अमूमन यह देखा जाता है कि पोषण पुनर्वास केंद्रों (एनआरसी) में उपचार के बाद जब बच्चे घर लौटते हैं, तो परिवारों की सीमित आर्थिक क्षमता और माताओं में पोषण संबंधी जागरूकता की कमी के कारण वे दोबारा कुपोषण चक्र में फंस जाते हैं। जून 2025 में हुए एक व्यापक सर्वे के दौरान जिले में 1,307 गंभीर कुपोषित बच्चों की पहचान होने पर समस्या की गंभीरता और स्पष्ट हो गई। इसी चुनौती को एक बड़े अवसर में बदलते हुए विदिशा जिला कलेक्टर श्री अंशुल गुप्ता के नेतृत्व में ‘पोषण संजीवनी अभियान’ की परिकल्पना की गई, जिसका मूल ध्येय बच्चों का तात्कालिक उपचार नहीं बल्कि उनका दीर्घकालिक सुपोषण सुनिश्चित करना था।
अभियान के तहत प्रत्येक चिन्हित गंभीर कुपोषित बच्चे को तीन महीने तक अतिरिक्त पोषण देने के लिए ₹3000 मूल्य की विशेष ‘सुपोषण किट’ प्रदान की जा रही है। उच्च गुणवत्तायुक्त पौष्टिक तत्वों से भरपूर इस किट में दो किलो मूंगदाल, एक किलो बेसन, पंद्रह सौ ग्राम मुरमुरा, एक लीटर खाद्य तेल, एक किलो शुद्ध घी, डेढ़ किलो मूंगफली, एक किलो गुड़ पाउडर, दो किलो मल्टीग्रेन आटा, एक किलो सत्तू, दो किलो चावल और पांच सौ ग्राम तिल जैसी अत्यंत पौष्टिक सामग्रियां शामिल की गई हैं। यह संतुलित आहार बच्चों को प्रतिदिन लगभग 750 अतिरिक्त कैलोरी प्रदान करता है, जो उनके शारीरिक विकास के लिए संजीवनी साबित हो रहा है।
इस पूरे अभियान की सफलता के पीछे जनभागीदारी एक प्रमुख कारण बना। इस पुनीत कार्य में समाज के विभिन्न वर्गों, स्थानीय व्यापारियों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने अभूतपूर्व संवेदनशीलता का परिचय दिया। समाज के सामूहिक प्रयासों से देखते ही देखते ₹39.21 लाख की सम्मानजनक राशि स्वेच्छा से एकत्र हो गई, जिसके माध्यम से अब तक सभी 1,307 बच्चों तक सुपोषण किट पहुंचाई जा चुकी है। यह जनसहयोग इस बात का सशक्त प्रतीक है कि समाज अपने नौनिहालों के स्वास्थ्य के प्रति कितना सजग और उत्तरदायी है।
तकनीक और जमीनी निगरानी से सफल परिणाम
प्रशासन ने केवल राशन वितरण तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि माताओं के व्यवहार में स्थायी बदलाव लाने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग के जमीनी अमले को पूरी मुस्तैदी से काम पर लगाया। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा माताओं को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों से सरल और पौष्टिक व्यंजन जैसे लड्डू, हलवा और सत्तू पेय बनाने की विधियों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। इसके साथ ही, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और आनंद को ध्यान में रखते हुए उन्हें खिलौना किट और स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के लिए टिफिन व पानी की बोतलें भी उपहार स्वरूप दी गईं। तकनीक और कड़े पर्यवेक्षण के मोर्चे पर भी यह मॉडल बेहद सुदृढ़ है। ‘पोषण ट्रैकर’ ऐप के माध्यम से प्रत्येक बच्चे के चयन से लेकर उसकी शारीरिक प्रगति का संपूर्ण डिजिटल रिकॉर्ड संधारित किया जा रहा है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा नियमित रूप से घर-घर जाकर बच्चों की वृद्धि निगरानी की गई। वहीं विभाग के पर्यवेक्षक लगातार बच्चों का वजन मापकर उनकी वास्तविक स्थिति का जमीनी आकलन कर रहे हैं।
63% से अधिक बच्चे हुए सामान्य
इस बेहद सुनियोजित और समन्वित प्रयास के जो परिणाम निकलकर आए हैं, वे राज्य स्तर पर बेहद उत्साहजनक और प्रेरणादायी हैं। जिले के कुल 1,307 कुपोषित बच्चों में से 772 बच्चे पूरी तरह स्वस्थ होकर सामान्य श्रेणी में आ चुके हैं, जिससे 63.02% की उल्लेखनीय और ऐतिहासिक रिकवरी दर दर्ज की गई है। यह शानदार सफलता इस अभियान को मध्यप्रदेश के अन्य जिलों के लिए भी एक अनुकरणीय ‘रोल मॉडल’ के रूप में स्थापित करती है। यह अभियान अब एक प्रशासनिक पहल से आगे बढ़कर विदिशा में एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। जिला प्रशासन के सशक्त नेतृत्व में अब स्वयंसेवी संस्थाओं, प्रबुद्ध समाज सेवियों एवं विभिन्न सरकारी विभागों की सक्रिय अंतर-विभागीय भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। विभाग द्वारा इन गंभीर कुपोषित बच्चों की सतत और गहन निगरानी की जा रही है ताकि परिवर्तन केवल कागजी आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि हर बच्चे के स्वस्थ भविष्य के संकल्प में बदले।
भविष्य की तैयारियों को लेकर भी सरकार और प्रशासन की प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है। आगामी तिमाही के लिए 650 नए गंभीर कुपोषित बच्चों को इस अभियान से जोड़कर कुपोषण मुक्त करने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया है। कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के तहत एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अडाणी फाउंडेशन के सहयोग से जून माह में लटेरी, सिरोंज एवं कुरवाई जैसी दूरस्थ परियोजनाओं के चिन्हित गंभीर कुपोषित बच्चों के बीच 500 अतिरिक्त सुपोषण किट के वितरण का लक्ष्य रखा गया है। विदिशा का यह सुपोषण मॉडल यह संदेश देता है कि जब शासन, प्रशासन, समाज और संस्थाएं एकजुट होकर पूरी संवेदनशीलता से कार्य करते हैं, तो कुपोषण जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ जीत सुनिश्चित हो जाती है।

भोपाल : सोमवार, जून 8, 2026,
वन एवं वन्यजीव संरक्षण के लिए मध्यप्रदेश में चलाए जा रहे सघन अभियानों के तहत वन्यजीव मुख्यालय ने इंटरपोल के रेड नोटिस जारी तीन फरार अंतर्राष्ट्रीय वन्यजीव तस्करों की गिरफ्तारी एवं उनके संबंध में सूचना देने वालों के लिए कुल 2 लाख रुपये की इनामी राशि घोषित की है।
स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स (एसटीएसएफ) की भोपाल इकाई द्वारा वर्ष 2015 में दर्ज एक प्रकरण में बाघ के अवैध शिकार तथा उसके अंगों की अंतर्राज्यीय एवं अंतर्राष्ट्रीय तस्करी के मामले में मुख्य आरोपी जे.ई. तमांग (दिल्ली) और ढरके लामा (काठमांडू, नेपाल) पिछले लगभग दस वर्षों से फरार हैं। इसी तरह एसटीएसएफ की शिवपुरी इकाई द्वारा दर्ज कछुओं एवं घड़ियालों की अंतर्राष्ट्रीय तस्करी से जुड़े प्रकरणों में आरोपी अल हज़ मोहम्मद शफ़ीकुल इस्लाम उर्फ रहमान तालुकदार (ढाका, बांग्लादेश) की भी अब तक गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। तीनों आरोपियों के विरुद्ध संबंधित न्यायालयों द्वारा स्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी किए जा चुके हैं।
अपराधों की गंभीरता तथा आरोपियों की संभावित अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियों को देखते हुए इंटरपोल द्वारा तीनों आरोपियों के विरुद्ध रेड नोटिस जारी किए गए हैं। इनके संबंध में सूचना देने अथवा गिरफ्तारी में सहयोग करने वालों के लिए वन्यजीव मुख्यालय ने जे.ई. तमांग पर 1 लाख रुपये तथा ढरके लामा एवं रहमान तालुकदार पर 50-50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया है।
वन्यजीव मुख्यालय ने आमजन से अपील की है कि वांछित आरोपियों के संबंध में कोई भी सूचना मोबाइल नंबर 9424792115, 9424797059 एवं 9424797031 पर दी जा सकती है। सूचना देने वाले व्यक्ति की पहचान पूर्णतः गोपनीय रखी जाएगी।
उज्जैन। शहर के ऐतिहासिक सती गेट क्षेत्र में प्रस्तावित सर्किल और सड़क निर्माण परियोजना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि स्वीकृत डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) में बदलाव कराने के लिए कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा दबाव बनाया जा रहा है, जिससे शहर के विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
जानकारी के अनुसार, नगर निगम द्वारा तैयार और स्वीकृत डीपीआर में सती गेट को केंद्र में रखते हुए सर्किल निर्माण का प्रस्ताव है। योजना के तहत गेट के दोनों ओर लगभग 25-25 फीट चौड़े मार्ग विकसित किए जाने हैं। बताया जा रहा है कि प्रस्तावित निर्माण से कुछ निजी संपत्तियां प्रभावित हो सकती हैं, जिसके चलते परियोजना को लेकर विरोध के स्वर सामने आए हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सती गेट केवल एक ऐतिहासिक संरचना नहीं, बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इतिहासकारों और क्षेत्र के जानकारों के अनुसार यह स्थल किसी मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि एक स्मृति-चिह्न के रूप में निर्मित हुआ था, जहां तीन प्रवेश द्वार होने के उल्लेख मिलते हैं। नागरिकों का दावा है कि वर्तमान में दो द्वार उपयोग में हैं, जबकि तीसरे द्वार को भी संरक्षित कर सार्वजनिक रूप से खोला जाना चाहिए।
मामले में यह भी मांग उठी है कि पुरातत्व विभाग की मदद से सती गेट के आसपास हुए संभावित अतिक्रमणों की जांच कराई जाए। नागरिकों का कहना है कि ऐतिहासिक संरचना की सुरक्षा दीवारों और मूल स्वरूप को संरक्षित रखने के लिए अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई आवश्यक है।
वहीं दूसरी ओर शहर के कई लोगों ने नगर निगम से आग्रह किया है कि स्वीकृत डीपीआर के अनुसार ही कार्य कराया जाए और किसी प्रकार का परिवर्तन न किया जाए। उनका मानना है कि सती गेट को केंद्र में रखते हुए सर्किल निर्माण एवं क्षेत्र का सौंदर्यीकरण यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने के साथ-साथ शहर की ऐतिहासिक पहचान को भी मजबूती देगा।
अब निगाहें नगर निगम प्रशासन पर टिकी हैं। नागरिकों का कहना है कि निगम को पुरातत्व विभाग से समन्वय स्थापित कर तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए तथा विकास और विरासत संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए निर्णय लेना चाहिए।
सती गेट परियोजना को लेकर बढ़ी इस बहस ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि शहर के विकास कार्यों में जनभावनाओं, ऐतिहासिक धरोहरों और प्रशासनिक योजनाओं के बीच सामंजस्य किस प्रकार स्थापित किया जाए। आने वाले दिनों में नगर निगम का निर्णय इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगा।