आज के अति महत्वपूर्ण समाचार

परिसीमन पर सियासत तेज, वैश्विक मोर्चे पर युद्ध विराम के बीच कूटनीति का नया दौर

नई दिल्ली। देश की राजनीति में परिसीमन (Delimitation) को लेकर घमासान तेज हो गया है। विपक्ष ने साफ कहा है कि 2027 की जनगणना से पहले किसी भी प्रकार का परिसीमन स्वीकार्य नहीं होगा। उनका तर्क है कि बिना ताजा आंकड़ों के निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

विपक्षी नेताओं ने यह भी मांग रखी कि परिसीमन आयोग के गठन की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और इसमें किसी एक दल का वर्चस्व न हो। आयोग के गठन को लेकर दो-स्तरीय व्यवस्था—केंद्रीय और राज्य स्तर—की भी बात सामने आई है, जिससे संतुलन बना रहे।


वैश्विक स्तर पर युद्ध विराम, लेकिन सवाल बरकरार

दूसरी ओर, मध्य-पूर्व में लेबनान और इजराइल के बीच 10 दिन का युद्ध विराम लागू हुआ है। इस घटनाक्रम के पीछे कूटनीतिक दबाव को अहम माना जा रहा है।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि शांति वार्ता सफल होगी और युद्ध विराम आगे भी जारी रह सकता है। हालांकि, उनके इस बयान पर संदेह भी जताया जा रहा है, खासकर ईरान से जुड़े दावों को लेकर।

सूत्रों के मुताबिक, ईरान, अमेरिका और अन्य देशों के बीच बैकडोर डिप्लोमेसी जारी है, जिसमें पाकिस्तान भी एक मध्यस्थ की भूमिका में नजर आ रहा है।


हार्मुज और प्रतिबंधों पर नई चर्चा

हार्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी स्थिति दिलचस्प बनी हुई है। खबरें हैं कि यहां से नाकेबंदी हटाने और ईरान को नियंत्रण बनाए रखने की बात हो रही है। साथ ही, अमेरिका द्वारा ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाने और उसकी जब्त संपत्ति लौटाने जैसे मुद्दे भी चर्चा में हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह सहमति बनती है, तो यह पूरे क्षेत्र में स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम होगा।


अमेरिका-इजराइल संबंधों में खिंचाव

इसी बीच, अमेरिका द्वारा इजराइल को सैन्य सहायता देने में अनिच्छा दिखाने की खबरों ने दोनों देशों के रिश्तों में हल्का तनाव पैदा कर दिया है। अमेरिका के भीतर भी राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है और रक्षा मंत्री की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं।


देश में सियासी वार-पलटवार जारी

देश के भीतर भी राजनीतिक माहौल गर्म है। महिलाओं की सुरक्षा, योजनाओं के क्रियान्वयन और संसद के विशेष सत्र में हुए खर्च को लेकर सरकार पर निशाना साधा जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने समय रहते फैसले नहीं लिए, जिससे हालात बिगड़े।


नई राजनीतिक व्यवस्था का प्रस्ताव

इस बीच एक नई राजनीतिक सोच भी सामने आई है—“लोकप्रिय सरकार” का विचार। इसके तहत सभी दलों को उनकी ताकत के अनुसार सरकार में भागीदारी देने की बात कही गई है। साथ ही, सबसे बड़े दल का प्रधानमंत्री और दूसरे नंबर के दल का उपप्रधानमंत्री बनाने का सुझाव दिया गया है।